एक नसीहत

———-एक नसीहत ———-

ऐसा ना हो अपनों की नज़रों से आज उतर बैठे
तुष्टिकरण के ज़हर से ना खुद्दारी तेरी मर बैठे
तू है दिनकर, तिमिर मिटाने, पहुँचा है रजनी के घर
पर उसकी कालिख से ना मुँह अपना काला कर बैठे

फ़िर से मौसम मानवता का आदमखोर न हो बैठे
जिसको चुना सिपाही है वो खुद ही चोर न हो बैठे
बस तुझसे उम्मीद है बाकी नई सुबह इक लाएगा
पर बादल और सूर्यग्रहण हो ऐसी भोर न हो बैठे

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
9675426080