दिल्ली ने अपने दिल में गर थोड़े अंगार भरे होते

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“दिल्ली ने अपने दिल में गर थोड़े अंगार भरे होते”

सौ-सौ पल घुट कर जीने से अच्छा इक बार मरे होते
दुश्मन के हमने माफ नहीँ गर अत्याचार करे होते
भारत का ध्वज कश्मीर तो क्या पूरी दुनिया में लहराता
दिल्ली ने अपने दिल में गर थोड़े अंगार भरे होते

हमने अपने शावक भी गर सरहद से पार करे होते
दुश्मन जो गुस्ताखी करते कुत्तों की मार मरे होते
फिर हिम्मत ना होती उसकी नापाकी चाले चलने की
चरखे को छोड़ जो शेखर की पिस्टल से वार करे होते

अमरीका, चीन दोगलो जैसे भी गद्दार डरे होते
हमने गर भीख माँगकर ना घर में व्यापार करे होते
फिर गली-गली से बम विस्फोटों की आवाजे आती ना
यूएन पे छोड़ भरोसा गर खुद ही हुंकार भरे होते

कायरता के किस्से ना हमने हद से पार करे होते
दुश्मन के घर घुसकर सामूहिक नर संहार करे होते
फिर दुश्मन आँख दिखाने की हिम्मत ना दोबारा करता
छोड़ गाल हमने अपने आगे हथियार करे होते

गुलशन को एक टोकरी में दूजी में ख़ार भरे होते
बुद्धों के संग शौर्य ज्ञानोदय के भण्डार भरे होते
फ़िर शिक्षा के मंदिर में गद्दारी बिगडैले करते ना
हमने पुस्तक में राणा से जीवन के सार भरे होते

————–कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
9675426080

5 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/04/2016
  2. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 26/04/2016
    • कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह "आग" कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह "आग" 26/04/2016
  3. कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह "आग" कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह "आग" 26/04/2016
  4. कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह "आग" कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह "आग" 26/04/2016

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