सूखा

टूट-टूट कर बादल
दूर-दूर हैं जाते,
दूर-दूर से बूंदों
को समेट कर लाते।
अम्बर की आँचल गीली,
कुछ नीली कुछ काली,
उसमें सिमटी है ममता,
जिससे जीवित है
दुनिया सारी।।

पर कुछ दिनों से
जाने अम्बर सोच रहा है क्या,
कहीं डूब रही है धरा,
कहीं बुझ नहीं रही
उसकी तृषा ।

जाने क्या है
अम्बर के मन में,
फूल खिला नहीं रहा
वो उपवन में ।।

सूख गईं तालाबें,
सूख गईं हैं पोखर,
सूख गए हैं कंठ,
सूख गए हैं घर।
फटती जा रही है धरा,
सूखती जा रही फसल,
तड़पती धरा बार-बार
माँग रही है जल।।

क्यों बैठे हो
अम्बर चुप-चुप,
देखो सूख रहा है सबकुछ,
बोलो बूंदें कहाँ बैठी हैं
छुप-छुप।

सुनो अम्बर,
भेजो जल्दी बूंदों को,
तृप्त करो
पशु,मनु,परिंदो को ।।
तृप्त करो
प्यासी नदियों को,
सूने पर्वत को,
तृप्त करो
मुरझाए फूलो को,
सिमटे पेड़ों को ।

देखो अम्बर!
कितनी आँखें उठी हैं ऊपर,
कितनी हाथें उठी हैं ऊपर,
सब कर रहे तुमसे फरियाद,
सूखे से करो तुम आजाद।
सुन कर इतनी फरियाद भी
जो पिघला नहीं
तुम्हारा मन,
तो सुनो हे अम्बर!
व्यर्थ है तुम्हारा जीवन ।।
व्यर्थ है तुम्हारा
चहुँ ओर फैले रहना,
व्यर्थ है तुम्हारा
झुककर धरा पर
जताना उस पर
अपना अधिकार ।

हे अम्बर!
अगर बनोगे इतने कठोर,
तो टूट जाएगी
धरा से बंधी तुम्हारी डोर।।
जो धरा सूख फट जाएगी,
तो तुम भी मिट जाओगे,
खोकर स्नेह और अधिकार,
भला तुम कैसे जी पाओगे??

रह जाओगे तुम अकेले
रात-दिन के साथ,
नहीं रहेगी धरा
सुनने के लिए
तुम्हारी बात।

अलका

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/04/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 08/04/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/04/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 08/04/2016
  3. Jay Kumar 08/04/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 08/04/2016

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