स्वप्न………………

मैं स्वर्ण जड़ित सुसज्जित रथ पर सवार
चला जा रहा था हवाओं को चीरता हुआ
अनुभूति लिए की संसार कितना सुंदर है
ह्रदय भाव विभोर हो हिलोरे मारता हुआ

अल्प दूरी ही तय हो पायी थी संयोग से
एक देवदूत मिला शांत बैठा हुआ भोर में
यकायक मैंने पूछ लिया क्या हुआ हे खग
विहंगम दृश्य प्रभात का नहीं गूंजा शोर में

प्रत्युत्तर में बोला विषादपूर्ण भाव लिए
किस दृष्टि से देखा लिया दिव्यलोक को
प्रत्येक क्षण आशंकित रहता आखेट से
जाने किस पल पहुंचा देगा म्रत्युलोक को

अवश्यमेव होगा वो तुम्हारा ही कोई सगा
ये मानव जाति ही तो है तुम्हारी सम्बन्धी
छल, कपट, प्रलोभन, वासना अमिषभोजी
इन सब में निहित है मनुष्य की जुगलबंदी

सुरुचि पूर्ण वो कब किसी को समझता है
मानो समस्त सृष्टि ही हो उसके अधीन
स्वेच्छा अनुरूप संहार करता है सबका
भ्रम वश समझता है सब उसके अधीन

हाँ ये सृष्टि निस्संदेह दर्शनीय स्थल है
यदि मनुष्य रखता इसे स्वार्थ से परे
स्वर्ग लोक यही तो निहित किया ब्रह्मा ने
लेकिन बन डाला मनुष्य ने नर्क से परे

व्योम का कर व्यभिचार अस्तित्व मिटा दिया
दुनिया को जन्नत से जहन्नुम में मिला दिया
बनाया था कुदरत ने इंसान को नायाब फरिश्ता
फ़रिश्ते ने इसे हैवानियत का अड्डा बना दिया

वक्तव्य उसका मेरे ह्रदय को चीर रहा था
निरुत्तर हो निर्लज्ज सा मन कोस रहा था
सहसा हो अचेत में रथ से धड़ाम गिरा था
आँखे खुली तो जाना स्वप्न देख रहा था !!

!
!
!
डी. के. निवातियाँ _________!!

10 Comments

  1. Anuj Tiwari 08/04/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/04/2016
  2. sarvajit singh sarvajit singh 08/04/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/04/2016
  3. Dr. Geeta Chauhan 08/04/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/04/2016
  4. C.M. Sharma babucm 08/04/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/04/2016
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/04/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/04/2016

Leave a Reply