रावण मर गया ?

लो रावण मर गया… लो रावण जला डाला…
सब और ख़ुशी का माहौल….जैसे रावण सच में मर गया …

कितने बेदर्द हो गए हम की दर्द सीने में नहीं उठा…
जब दो बच्चों को हमने ज़िंदा जला डाला……
दूसरों को दर्द दे कर खुश होने की….फितरत हो गयी है …..
किसी की आह हमारी वाह वाह हो गयी है…..
फिर भी कहते हैं की रावण मर गया…..

उजले कपडे पहने हम भाषण देते हैं…
धरम के नाम कभी जाती के नाम पर…
रोज़ रोटी सेंकते हैं….भूखे को भी निचोड़ लेते हैं….
फिर भी कहते हैं की रावण मर गया….

कितने घरों के दीप हमने बुझा दिए…..
बूढी आँखों की रौशनी छीन ली हमनें…..
कितनी ही कोखों को सूना कर दिया….
फिर भी कहते हैं की रावण मर गया….

हर किसी को मोहब्बत का पैगाम दो तो मैं जानू…..
जात धर्म से ऊपर उठ कर बात करो तो मैं जानू…
राम बनने को नहीं कहता….इंसान बनो तो मैं जानू …..
सच में रावण मर गया….

(यह कविता विजय दशमी के पास लिखी थी उस सन्दर्भ में जब हरियाणा में २ बच्चों को घर में ज़िंदा जल दिया गया था.)

/सी. एम. शर्मा (बब्बू)

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/04/2016
    • babucm babucm 08/04/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/04/2016
    • babucm babucm 11/04/2016

Leave a Reply