गंगा

निर्मल है,पावन है,स्वच्छ है गंगा l
चीख-चीख के कह रही ये गंगा l
पापों को तुम्हारे मैं हर लूंगी l
पर मत करो मुझे और गन्दा ll

इसी जल के स्नान से पवित्र होते l
फिर क्यों इसमें तुम कपड़े धोते l
पूजा-सामग्री क्यों इसमें बहाते l
धर्म की आड़ में गन्दगी फैलाते ll

स्वच्छ मैं रहूंगी तो स्वच्छ रख पाऊँगी l
निर्मल जल से गंगा कहलाउँगी l
गंदगी से यू मेरा अस्तित्व ना रहेगा l
मैं ना रही तो, तू भी ना रहेगा ll

करुँ मैं विनती तुमसे बन्दे l
हर हर गंगे जय माँ अम्बे l
मिलकर गंगा को स्वच्छ बनाओ l
निर्मल रखो और खुद तर जाओ ll

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2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/04/2016
    • Rajeev Gupta Rajeev Gupta 08/04/2016

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