अपने ही करम से||ग़ज़ल||

अपने ही करम से इंसान है तंग |
यहाँ जीवन खेल है,जीवन है जंग |

असलियत छिपा कर चलते है लोग ,
किसे पता किसका ईमान हैं बदरंग |

चलते नहीं क्यों, कोई सीधे राह में ,
वक्त के इंतज़ार में जीवन है दरंग |

ऐसे नीरस जीवन का क्या फायदा ,
न खुद कि साया न मन है संग |

आसमा में बेखौफ़ उड़ता क्यों नहीं,
छू नयी ऊचाँई को जीवन है पतंग |

दुष्यंत कुमार पटेल “चित्रांश”

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/04/2016

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