खो गया शायद बच्चो का संसार a poem of school life stress by Alok Upadhyay

लाद के कंधो पे भारी से बस्ते,

चल पडे वहाँ

जहाँ भटका गएँ रस्ते,

रो-रो कर करने लगे वो पढाई,

मानो किताबो से है उनकी लडाई.,

माँ-बाप को बच्चो से ज्यादा है उनके नम्बरो से प्यार,

खो गया शायद बच्चो का संसार…!

लिख-लिख कर घिस गई कोमल हथेलियाँ,

व्यस्त हो गएँ यार दोस्त

अकेली हो गई सहेलियाँ.,

बाते भी होने लगी सिर्फ काम की…

ना होती अब अंताक्षरी

ना होती है पहेलियाँ.,

उनके सपनो मे भी आने लगी टीचर की मार,

खो गया शायद बच्चो का संसार.,

यह सोचकर की बच्चे हो ना जाएँ फेल,

बंद कर दिएँ उनके मजेदार खेल.,

घर तो चार दीवार का है ही…

स्कूल को भी बना दिया बेपरवाहो ने जेल.,

ना लेनी दी उन्हे साँसे

किया वार पे वार.,

खो गया शायद बच्चो का संसार…!

आ गएँ अगर गलती से भी नम्बर कम,

निकाल लेंगे हैवान बिचारो के दम.,

कहेंगे

देख पडोसी के लडके आए नम्बर ज्यादा..

और तेरे कितने कम…

क्या मिलेगा छीन कर आपको उनकी मूस्कान,

समझो की

क्या चाहती है आप से नन्ही-सी जान.,

जी लेने दो जिंदगी उनको एक बार…

लौटा दो बच्चो को उनका संसार.,

दो एक बार उन्हे उनका प्यार…

लौटा दो बच्चो को उनका संसार.,

भारी से बस्ते लो उनके ऊतार,

लौटा दो बच्चो को उनका संसार..

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.

लौटा दो बच्चो को उनका संसार…!!!

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/04/2016
  2. Saviakna Saviakna 07/04/2016

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