चीतियाँ विश्वास की….

मैं थी साधारण
ना कोई हाव ना कोई भाव
पर थी कुछ बात मुझमे
पलट जाते थे राहगीर राहों में
पर एक शख्स
जिससे करती मैं
बेइन्तहा मुहब्बत
एहसास दिलाता
मेरी कमियों का
ये दुर्बलता मेरी
आ जाती उसकी बातों में
रोती, तड़पती, बिलखती
पर अचेतन मन में
कही जलता था चिराग
एक मद्धिम सी थी आँच
जिस पर पकती थी चीतियाँ
लेकर वही आँच जाती दर – बदर
मिल जाये कही आत्मविश्वास की आग
और फुल जाये चीतियो भरी ये रोटी…….. … .. .. ..

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