सोचो ! अगर इंसान न होता… (एक और प्रयास)

सोचो ! अगर इंसान न होता
तो क्या बुरा होता
और क्या अच्छा होता
सोचो ! अगर इंसान न होता…

ज़मीं पे ये जो पड़ा होता है न ‘कूड़ा’
ये न होता
और परिंदे भी आसमान में चैन की सांस लेते,
जीव जंतु भले ही निर्भय नही विचरते
किन्तु कम से कम छुरी से काटे और
आग में भूने भी नही जाते,
सोचो ! अगर इंसान न होता…

सभी कुछ एकदम शुद्ध होता
जल में नीर होता, अग्नि में आग होती
पवन में वायु और आसमान में शून्य होता,
ज़मीं पर वृक्ष ही वृक्ष लहलहाते
वृक्ष पे फूल और फल लगते
हाँ मगर, वृक्षों को काटने वाला इंसान न होता.
सोचो ! अगर इंसान न होता…

हर सिम्त हरियाली ही हरियाली होती और
हर दिशा में फूल ही फूल नज़र आते
मगर, उन फूलों को अपने अपने उद्देश्य हेतु,
तोड़ा न जाता.
ऊँचे पर्वत होते, टीले होते, नाले होते
तालाब, नदियाँ और सागर भी होते,
किन्तु इन सबको प्रदूषित कर पाने वाला
इंसान न होता,
सोचो ! अगर इंसान न होता…

तेरा मेरा कुछ न होता, सरहदे भी नही होतीं
रामायण, गीता, क़ुरान, बाइबल
कोई मजहबी किताब न होती,
भूख, गरीबी, लाचारी, लालच और घृणा
इन शब्दों का कोई स्रोत न होता
हर तरफ बस प्रेम से युक्त
प्रकृती होती और कुछ भी न होता
सोचो ! अगर इंसान न होता…
सोचो ! अगर इंसान न होता…

— अमिताभ ‘आलेख’

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/04/2016
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 07/04/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/04/2016
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 07/04/2016

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