स्वार्थ

जब अम्बर अपने रंग में था,
ईश्वर को छुपाए
अपने अंग में था,
तब मही भी प्रकाशों से
चमक रही थी,
हरयाली का आँचल ओढ़े
दमक रही थी ।
नदी भी गुनगुना रहे थे,
झरने भी झन- झन
अपने पायल बजा रहे थे। ।
पहाड़ों की ऊँची -ऊँची चोटियाँ
रंगों में डूब
मुग्ध खड़ी थी,
परिंदों को पथ दिखला
हर पल हर्षित हुईं थीं ।

देख कर प्रकृति की सुंदरता,
ईश्वर के मुख-मण्डल पर
छाई थी प्रसन्नता ।।

पर जाने क्या बात हुई ,
दूसरे हीं छन
ईश्वर की खुशियाँ
मौन हुई।

तभी शीतल हवायें आई,
ईश्वर के चरणों में समाई।
उसने पूछा धीरे-धीरे,
भला कौन सी चिंता है
आपको घेरे।।

थोड़ा रूक कर ईश्वर बोले –
मैं हूँ हैरान
अपनी हीं रचना पर,
परेशान हूँ मनुष्य की
बदलती संरचना पर।

जब मैनें बनाया था मनुष्य
तब था मैं बहुत खुश,
सोचा था,
प्रकृति और निखरेगी,
मनुष्य के मदद से
सुंदरता और बिखरेगी।।
पर वो तो अपने मन के हो गए,
अपनी खुशियों के लिए
स्वार्थ तले दब गए ।

स्वार्थ ने उनको ऐसा घेरा,
रिश्तों का सारा अर्थ बिखेरा।
कहीं खोकर स्वार्थ में,
बेटा नहीं रह रहा
माँ-बाप के साथ में ।
तो कहीं ममता पर हीं
भारी पर रहा स्वार्थ,
साँसों को थामने से पहले हीं,
काट दिए जा रहे
बेटी के हाथ।।

स्वार्थ की चल रही है
ऐसी आँधी,
हर दिन खून से रंग रही है
मही की माटी।
स्वार्थ ने बदल दिया है
प्रकृति का रंग,
क्रोध,ईष्या, लोभ और दुराचार है
अब इंसा के संग।।

सुनकर प्रभु की बात,
हवा ने ली गहरी साँस ।
बड़े विनय से बोली हवा
हे प्रभु! क्या इस मर्ज़ की
नहीं है कोई दवा।।
क्या इंसा ऐसे हीं टूटते जाएँगे,
दूसरों को मारते
और खुद मरते जाएँगे ।

सुनकर हवा की बात,
देखकर प्रकृति के
बिगड़ते हालात,
ईश्वर ने आँखें मूंद ली,
एक गहरी खामोशी ओढ़ ली ।।

देखकर प्रभु की
ये मुद्रा,
हवा गई घबरा,
लेकिन हवा गई थी समझ,
हवा गई थी जान,
की अब स्वार्थ की सजा
मिलेगी इंसा को,
अब वो झेलेगें,
बाढ़,सूखा और भूकंप को ।

अलका

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/04/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 03/04/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 03/04/2016

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