अकेलापन

अकेले में बैठी सोच रही थी,
थोड़ी हँस रही थी,
थोड़ी रो रही थी,
पर अकेलेपन को
नहीं कोस रही थी।

मैं सोच रही थी –
अकेलापन बुरा नहीं होता,
जब कोई नहीं होता,
तब साथ वही है होता।।

जब रिश्तें जाते हैं टूट -टूट,
और अपने जाते रूठ-रूठ,
तब मन अकेला बैठ-बैठ,
कर लेता है अकेलेपन से हीं पैठ।

जब उमड़-उमड़ अाती
मन की वेदना,
पर समझना नहीं चाहता
कोई मन की संवेदना,
तब अकेलापन सिखाता है
मन को सहना,
हर स्थिति में
मन को ढलना।।

जब टूटे सपनों को
हाथ पर लेकर,
मन बार-बार है रोता,
बिना कुछ पाए,
कुछ खोने पर,
मायूसी को ढोता,
तब अकेलापन हीं
खामोशी से,
खामोशी में,
उम्मीद की बीज है बोता।

जब पीछे छूट जाती हैं यादें,
धुँधली पर जाती हैं
पुरानी राहें,
तब अकेलापन खींच लाता है
उन्हें अकेले में,
आगे बढ़ चुके कदमों को
थाम लेता है पलकों में ।।

अकेलापन हीं सुख में डूबी यादों को फिर से संवारता है,
दुख में डूबे जख्मों को
फिर से सहलाता है ।

माना –
अकेलापन अकेला है,
खुशियों का नहीं लगता
यहाँ मेला है,
पर दुख में तो मन
इससे हीं बहला है ।।
जब -जब लगी है ठोकर,
तब-तब थामने के लिए बढ़ा हाथ
इसका हीं पहला है।

अलका

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/04/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 03/04/2016
  2. C.M. Sharma babucm 12/04/2016

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