मैं क्यों ना दूँ गाली

मेरी कविताओं को देशद्रोहियों के लिए गाली की संज्ञा देने वालों और मर्यादा का उल्लंघन बताने वालों से एक प्रश्न और जवाब —

रचनाकार- कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
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सत्ता की गलियां अब बन बैठी हैं कीचड़ की नाली
सूख रही है खुशियों की प्यारी पावन सी हरियाली
जिस पर बना पखेरा है सब काट रहे हैं वो डाली
गधों के घर में जन्नत है घोडो के घर पे कंगाली
बाग प्रेम से सींचा जो खुद आज उजाड़ रहा माली
फिर बतलाओ क्यों ना दूँ मैं कायर कुत्तों को गाली

लाल सलामी वाले अब सैनिक पर दोष लगाते हैं
भारत माता की बर्बादी के ज़यघोष लगाते हैं
मंदिर में अब बर्बादी के पाठ पढाए जाते हैं
अफजल की फोटो पर माला फूल चढ़ाये जाते हैं
महिषासुर से असुरों को निर्दोष बताया जाता है
आतंकी घटनाओं को इक रोष बताया जाता है
सरस्वती के मंदिर में जब हरकत हो फूहड़ वाली
फिर बतलाओ क्यों ना दूँ ————————–

रोज़ शहीदों की और हमलावर की गिनती बढ़ती है
फिर भी दरबारों की पाकिस्तान से विनती बढ़ती है
नक्सलियों और आतंकी के कृत्य भुलाए जाते हैं
दुष्टों की जांचों में खुद ही ही दुष्ट बुलाए जाते हैं
पर ना है परवाह किसी को उन वीरों की मांओं की
बुझते दीप देखते वो लाचार हताश पिताओं की
उजड़ रहीं माँगे सिंदूरी, उजड़ी होठों की लाली
फिर बतलाओ क्यों ना दूँ ————————–

न्याय तराजू के अब दोनों पलडे ऊपर नीचे हैं
सरेआम गुस्ताखी है फिर भी सब आँखे मींचे हैं
प्रज्ञा से निर्दोष हैं अंदर बाहर टुण्डा घूम रहे
अब तो थानेदार अँगूठे अपराधी के चूम रहे
जेलों में अपराधी की खातिर बजती है सारंगी
चिकन मटन बिरियानी लुटती जाम उमड़ते नारंगी
न्यायपालिका भी बन बैठी है नोटो की रखवाली
फ़िर बतलाओ क्यों ना दूँ ————————-

सत्ता पाकर दरबारी अपने वादों को भूल गये
तुष्टिकरण की आँधी में सब के सब ही तो झूल गये
भगवा राज है फिर भी मंडी बन्द नहीँ गौमास की
गौ संरक्षण की बातें अब वजह बनीं परिहास की
गौपालक गौमास बेचकर बातें करे विकास की
उम्मीदें सब धूमिल होतीं डोर टूटती आस की
गौवंशो की बोटी से घर-घर में सजती है थाली
फ़िर बतलाओ क्यों ना दूँ ————————-

सच्चाई ना देखे कोई सबकी आँखे धुंधली हैं
सिंहों का साहस भी अब कायरता की कठपुतली है
अब तो राणा के रण की चिंगारी होती ठंडी है
तभी मीडिया आगे है पीछे कोठे की रंडी है
आरक्षण के लालच में हिन्दू आपस में फूट रहे
बंधन प्रेम, एकता, भाईचारे वाले टूट रहे
केसरिया पगडी वाला अब टोपी देख रहा जाली
फिर बतलाओ क्यों ना दूँ ————————–

————कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”

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