मुक्तक-04

भले कौड़ी के भाव बिक रहा हो इश्क़, इस ज़माने में
अलबत्ता, सच्ची मोहब्बत दूर की कौड़ी है |

ये जो काश मैं कहता हूँ, इस आस में कहता हूँ
के आस की हक़ीक़त या काश सा सपना, कहीं तो महफ़िल तुमसे रोशन होगी |

इन आँखों में शायद थोड़ी बूँद सी पड़ी है
पर आसमां को तकना हमने अब भी ना छोड़ा |

रुपयों की खन-खन ने, बहोत कुछ बदला है ऐ “रोशन”
मैंने बचपन को माँ-बाप में बूढ़ा होते देखा है |

तुम सब जानते हो, ‘से तुम नहीं समझोगे…
बड़ी ही अजीब दास्ताँ है इश्क़ की…… |

है रंज नहीं ज़माने से, बस इस बात से डरता हूँ
गफ़लत थी जिससे इश्क़ की, वो भी इसी ज़माने से थे |

ये किस शहर, आ गए हम
यहाँ मन में शोर, और दिल में इतना सन्नाटा क्यों है ?
By Roshan Soni

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/04/2016
    • roshan soni roshan soni 02/04/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/04/2016
  3. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Er. Anuj Tiwari"Indwar" 03/04/2016

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