यादें…….

यह कविता मानव के जीवन में घटित घटनाओं
तथा जीवन के कई मोड़ों पर उपजी सुखद व दुखद स्मृतियों पर आधारित हैँ।यह पूर्णतः मेरी स्वरचित रचना है तथा इसका किसी व्यक्ति-विशेष से कोई संबंध नहीं है।

यादें…….

जीवन का हर एक पल,
हर जीवित क्षण
एक सपना-सा लगता है,
जीवन डगर में जो कुछ खोया है,
जाने क्यों सब अपना-सा लगता है,
मरूस्थल की वह बारिशें बनकर रह जाती हैं-यादें….
करता रहता हूँ समय से रुकने की गुज़ारिशें
पर वह रुकता नहीं,
बस ,बाकी रह जाती हैं-यादें…..ं
वह बीते दिनों की यादें
वह अपनों का प्यार-दुलार, वह मुलाकातें
खत्म हो जाती हैं,
बस ,बाकी रह जाती हैं-यादें…..

कैसी होती हैं यादें
कुछ खट्टी,कुछ मीठी,कुछ नमकीन,
होती हैँ यादें
हस्तियाँ मिट जाती हैं,
बस्तियाँ उजड़ जाती हैं,
बस ,बाकी रह जाती हैँ-यादें…..

भावहीन, पत्थरदिल को भी
पिघला जाती हैं यादें
बरसों के सूखे अँखरों पर
जल की कुछ बूँदें छलका जाती हैं- यादें…
रास्ते बदल जाते हैं
लोग बिछड़ जाते हैं
बस ,बाकी रह जाती हैं-…यादें…..यादें…..यादें…..

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/04/2016

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