न मैं हँसी, न मैं रोयी

न मैं हँसी, न मैं रोई
बीच चौराहे जा खड़ी होई

न मैं रूठी, न मैं मानी
अपनी चुप से बांधी फाँसी

ये धागा कैसा मैंने काता
न इसने बांधा न इसने उड़ाया

ये सुई कैसी मैंने चुभोई
न इसने सिली न उधेड़ी

ये करवट कैसी मैंने ली
साँस रुकी अब रुकी

ये मैंने कैसी सीवन छेड़ी
आँतें खुल-खुल बाहर आईं

जब न लिखा गया न बूझा
टंगड़ी दे खुद को क्यों दबोचा

ये दुख कैसा मैने पाला
इसमें अंधेरा न उजाला

Leave a Reply