प्रेम : एक अनमोल रतन

प्रेम एक अनमोल रतन
कब इसे तोल सका है धन
विस्तार मै इससे न बड़ा भुवन
बता दे इस जग को रे मन

नवग्रहों की तो क्या विसात
वैकुण्ठ भी अगर आ जाये हाथ
उसको भी न्योछावर कर दूंगा
प्रियतम के कदमो मै धर दूंगा.

जग मै मीरा बदनाम हुई
उस लगन की न शाम हुई
शक्ति भक्ति और प्रेम की
एक अद्धभुत व्याख्या
आज जगत के मुख पर वो लगाम हुई

सती ने जलकर त्याग किया
प्रथा मै अग्नि का स्नान किया
समर्पण की धरोहर बटोरकर
समाज से कटु बचनो का पान किया

किसी ने जीवन का दान दिया
किसी ने भविष्य कुर्बान किया
किसी ने समाज से लड़ते लड़ते
हर क्षण साथी का ध्यान किया

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