प्रेम अंकुर

हर रोज़ फ़ना होते जवान यंहां
अब और कितनी जान गंवाये
गूंगी जनता है, बहरे नेता जंहा
किसकी सुने किसको सुनाये !!

अपनी अपनी धुन में हो सब जहां
फिर किसी मरते को कौन बचाये
आग लगी हो जब सबकी धोती में
फिर दूजे की भला कौन बुझाये !!

हर कोई बंदर बना हर कोई मंदारी
असलियत कोई भी समझ ना पाये
कितनी बदल गयी फितरत इंसानी
मुर्ख समझ सब एक दुसरे को नचाये !!

इंतहा हो जाती है हर खौफ ऐे.मंजर की
जब आदमी में से इंसानियत खो जाये
जरुरत नहीं है फिर नफरत ऐ खंजर की
जब बातो ही बातो से कत्लेआम हो जाये !!

जरुरत क्या सोते हुए को जगाने की
जब जागे हुए ही निंद्रा रूप अपनाये
चाह नहीं पत्थर दिल को पिंघलाने की
बस ह्रदय में प्रेम अंकुर विस्फ़ुतित हो जाये !!
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डी. के. निवातियाँ

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/03/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 31/03/2016
  2. आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 31/03/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 31/03/2016

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