ठेस

जब मन में होती है प्रीत
तब खलती है दुनिया की रीत।
जब कोई हमें पहुँचाता ठेस
तो उसके प्रति जगता है द्वेष,
चलता है मन रीत के साथ,
छूटता है प्रीत का हाथ,
हम ठेस के बदले पहुँचाते ठेस,
प्रकट करते अपने हृदय का द्वेष ।।

पर मिटता है मन का तम,
जब हृदय का संताप
नहीं होता कम।
टूटता है हमारा भ्रम,
प्रीत ठेस याद कर,
अनजाने हीं जब आँखें
हो जाती हैं नम,
और भूल कर हम अपना गम
उनके दर्द में जाते हैं रम।।

तब हृदय से निकलती है
एक हीं आवाज,
कहता है समझो
रिश्तों का राज।
करने से यूँ झूठा नाज,
बिगड़ता है संगीत का साज।।
बनाकर अपने हृदय को क्रूर,
मत बिगाड़ो अपने जीवन के सुर।

ठेस के बदले ठेस पहुँचाना,
भला इस रीत को क्यों निभाना???
जब हृदय में प्रीत
बचा हो शेष,
तब कैसा ठेस?? कैसा द्वेष??

मिलते हैं दो किनारे,
समुद्र में उठती
भावनाओं के सहारे,
माना की क्रोध में बहकर,
कभी -कभी लहरें ऊफन कर,
किनारों को देतीं हैं पीछे छोड़,
लेकिन किनारों से नहीं देती
वो रिश्ता तोड़,
रूठ- मान कर वो
फिर वापस आती हैं,
और जीवन को देती हैं
एक नई मोड़।।

अलका

6 Comments

  1. Jay Kumar 31/03/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 31/03/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/03/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 31/03/2016
  3. आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 31/03/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 31/03/2016

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