==* ये भी क्या जीना *==

जी लू अब सपनो में मै
हकीकत ना रास आती है
तेरी जुदाई का जख्म उठाकर
मिली कुछ तनहाई है

सोचा न था कुछ यु भी होगा
सपना मेरा तो अधूरा है
प्यार का क्या तोहफा मिला है
हरतरफ बस सन्नाटा है

अब न कोई आरजू दिलमे
चाहत की परछाई बची है
जाने क्या सितम कर गई
मोहोब्बत कि जुदाई है

दिल का दर्द सहा न जाए
किस्मत कि रूसवाई है
तुम रूठी तो रूठी दुनिया
तुम्हारी बस परछाई है

छलनी होकर रह गया सीना
ये जीना कैसा जीना है
तुझसे बिछड़कर मिट गया हू
अब तो साँसे गिनना है

अब तो बस साँसे है गिनना
—————-//**—
शशिकांत शांडिले, नागपूर
भ्र. ९९७५९९५४५०
Ye bhi kya jina hai

Leave a Reply