दीदार-ए-यार-ए-ख्वाब की…

दीदार-ए-यार-ए-ख्वाब की हरसू है आरज़ू ।
ज़िन्दगी स्याह रात है ऐ ख्वाब कहाँ है तू ।।

ज़िंदगी में अब लगे है साँसें बुझी बुझी ।
थोड़ी जान तो अब डाल दे मेरी जाँ कहाँ है तू ।।

ऐ ज़िन्दगी ! अब और इंतज़ार नही होता ।
मेरी तक़दीर भी लिख दे ऐ ख़ुदा कहाँ है तू ।।

हर शख़्स ओढ़े घूम रहा ख़ुदगर्ज़ी का लिबास ।
किस दिल में तुझे ढूँढू ऐ वतन कहाँ है तू ।।

कभी ‘गुलज़ार’ बनकर तो कभी बनकर ‘अमीर’ ।
ढूँढा बहुत जिसे मेरी वो ग़ज़ल कहाँ है तू ।।

— अमिताभ आलेख

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/03/2016
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 31/03/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/03/2016
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 31/03/2016

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