अस्तित्व की लड़ाई

कुछ मिट जाने के लिए,
कुछ लुट जाने के लिए,
कहाँ होता रात का इंतजार
कभी-कभी दिन के उजाले भी
निगल जाते हैं
जिंदगी का सारा सार।

जब एक स्त्री के अस्तित्व की
लड़ाई है छिड़ती,
तब जाने क्यों
एक पल को
धरा काँप है जाती,
चाँदनी बादलो के
पीछे छिप जाती,
दिन की रोशनी भी
अपनी फ़िकी चमक से
किसी अनहोनी का
आभास कराती
और सर्द हवाएँ कहती हैं
मानो , कुछ ऐसा है घटने वाला
जिससे कई वर्षों तक
किसी की रूह
मरी हुई जन्मेगी,
अस्तित्व का तो पता नहीं
लेकिन उसकी अस्मत
धरा के शर्म को बेपर्दा कर
धरा में हीं मिला दी जाएगी ।।

एक समय –

जब वृक्ष अपनी पहचान के लिए
अड़ा खड़ा था,
उससे हीं है सृष्टि,
उससे हीं है तृप्ति,
उससे हीं है जीवन,
उससे हीं है बना सारा उपवन,
इस अटूट सत्य को
जब वह दर्शा रहा था
तभी कहीं से हत्यारे आएँ
उसकी रूह को वो वहीं
काट गिराए ।
हाँ!! केवल रूह को
वो काट गिराए ।।

फिर क्या……….

अब हवा के बिना
वो वृक्ष जीता है
पर जाने क्यों
कठोर हो चुकी जड़ें
अब भी हरी हैं ।

उसकी सारी डाले सूख चुकी हैं,
उसकी सारी पत्तियाँ झड़ चुकी हैं,
मन तो उसका रहा नहीं
बस अब हर सुबह
किरनें तीखी बन
उसके तन को जला जाती हैं
और सर्द हवाएं हर दिन
उसे दर्द का नया आँचल ओढ़ा जाती हैं ।।

हाँ!! वो अब भी जीवित है
पर ठूठ बन चुका है,
खड़ा है,
पर उसे अपनी डालो पर
किसी के आने की आस नहीं,
फिर से पुलकित होने के लिए
उसे अब बूंदों की प्यास नहीं ।

लेकिन आखिर कब तक
ऐसा होता रहेगा,
स्त्री के दर्द को
क्या कोई कभी नहीं समझेगा???
कब तक उसकी रूह को
यूँ हीं मारा जाएगा,
कब तक उसकी आबरू को
यूँ हीं नोंचा जाएगा
कब तक उसका खून
पानी बन बहता जाएगा ।।
कब तक…………
कब तक…………

अलका

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/03/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 29/03/2016

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