बाल-मजदूर

सड़क के किनारे खड़ी थी
स्कूली बच्चों की भीड़,
उनके साथ थे उनके शिक्षक और
उनके कुछ मीत।

जोर-शोर से लग रहे थे नारे
बाल-मजदूरी के खिलाफ ।।

उसी भीड़ के पास खड़ा था
एक बाल-मजदूर
पर उनकी नारे
उसकी समझ से थी
काफी दूर ।
वह मशगुल था अपने काम में
क्योंकि वो करता था विश्वास
सिर्फ रोटी के दाम में ।।

देखा मैंने –

उस बाल-मजदूर को
नजरअंदाज करते हुए
शिक्षकों ने आवाज को
ऊँचा उठाया
और अपने उसूलो और वादो को
वहीं दबाया।
आते -जाते लोगों की नजरें
प्रोत्साहित करतीं थी
उन बच्चों और शिक्षकों को
लेकिन दूसरे हीं पल
घृणा से देखतीं थी
उन बाल-मजदूरों को ।।

सुबह की किरनो के साथ
उठी आवाजें
ढलती किरनों के साथ
खो गईं थीं
और बाल-मजदूरों की
हक की बातें
सड़क के किनारे हीं
सो गई थी ।

सुबह से शाम तक
मजदूरी कर रहे बच्चे
घर लौट चुके थे,
दुनिया के छलावे से अनजान,
भूख मिटाने के लिए,
कल फिर काम पर जाना है
यह सोच अधूरी नींद की आगोश में
पड़े थे।।

अलका

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/03/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 29/03/2016

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