जुदाईयों से परे

बहुत हुआ
अब दिल में कोई
बेरहम सा अरमान जगाओ
खुली फिज़ाओं में ताको फिर
किसी हवा से कोई तूफ़ान मांग लाओ
कुछ ना सूझे ग़र तुम्हें जानम
तुम क़त्ल करने का
ज़माने से कुछ
बेहयाई भरा सामान मांग लाओ
ज़ख्मों की इक चादर
मेरे बदन पर बिखरा दो
किसी बात पर कभी तो
मुझे आसमां से गिरा दो
ठोकर से मेरे एहसासों को
खाक़ में मिला आओ
तुम तपती हुई धूपों में
मेरी खुशियाँ जला आओ
जुदा होने की मुझसे
कोई कोशिश तो कर के देखो
तबाह मुझे करने की
इक साज़िश तो कर के देखो
ये इश्क़ यूँ तो तमाशा बन गया है
मग़र फिर भी मुझे
तुमसे बिछड़ने के तरीके नहीं आते।

-आभा ‘आसिम’

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 28/03/2016
  2. आभा Abha.ece 28/03/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 28/03/2016
  4. आभा Abha.ece 28/03/2016

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