बेक़रारी (नज़्म)

यहीं नहीं हो तुम
हर जगह क्यूँ हो
बुझती हुई उम्मीदों में
जलती हुई साँसों में हो
नूर तुम्हारा मचल रहा है
सहर सहर के दामन पर
मैं ताक रही हूँ और तुम
ढलती शब की बाहों में हो
इस सिम्ट तुम्हारी क़ुरबत है
उस सिम्ट तुम्हारी जुदाई है
कितनी दिलकश है निग़ाह तुम्हारी
कितनी अज़ीज़ ये तन्हाई है
मेरे दायरे में मग़र तुम
नज़र क्यूँ नहीं आते
दूर उफ़क़ पर
आफ़ताब अपने ख़िताब
गंवा चुका है
चाँदनी अपना शवाब
तुम पर लुटा चुकी है
तुम साहिलों के भीगे दामन पर हो
मगर मेरी इन आँखों के
प्याले अब तक ख़ुश्क पड़े हैं
तुम ज़मीं से लिपटे हो
अब्र को क़बा सा ओड़े हो
ये दुनिया तुम्हें निहार रही है
मेरी नज़रों से अब तक दूर खड़े हो
मैं किससे पूछूँ पता तुम्हारा
कहाँ से लाऊं निशां तुम्हारे
यहीं नहीं हो तुम
हर जगह हो
मैं जानती हूँ
तुम्हें भी इल्म है मेरी बेक़रारी का
इस बार शायद मुझसे
तुम बहुत खफ़ा हो
वरना यहीं होते
सोचती हूँ मगर
मुझसे तुम
जुदा कब थे? -आभा ‘आसिम’

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  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/03/2016

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