तनहाई

अब अकेला नहीं तनहाई मेरे साथ होती है,
आग़ोश-ए-तसव्वुर में उनसे मुलाकात होती है,
सुर्ख आँखो को ढुंढती हर एक रात होती है,
अब उसके रुख़सार की चमक और होठों की मुस्कान मुझे सोने नहीं देती,
काश वो रात वही थम जाती तो हर सुबह तनहाई मेरे साथ नहीं होती।

अब आइना देखना तो बस बहाना होता है,
मेरी आँखो में उसका दीदार होता है,
उसकी मोहब्बत में भटक गए है हम,
तनहाई में हर पल इसका एहसास होता है।

पथ्थर से नहीं इंसा से मोहब्बत हुई है,
इसका एहसास करा दे मुज़को,
आइना बनकर बिताई है जिंदगी मैंने,
टूटने से बचा ले मुज़को|

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