अंतिम यात्रा

ना जाने क्यों आज मेरे चारों ओर मज़मा लगा कर खड़े हैं लोग
अभी अभी तो सोया हूँ चैन की नींद अभी मुझे जगा रहे हैं लोग
माहौल कुछ अज़ब सा दिख रहा है न जाने क्या जता रहे हैं लोग
ज़िन्दगी भर ना आये मेरे करीब आज आंसू बहा रहे हैं वह लोग

कुछ कह रहे मुझे डैड बॉडी कुछ लाश कह कर बुला रहे हैं लोग
अब क्या लो आ गये मेरे घरवाले भी और नाते – रिश्तेदार लोग
बांध दिया अब कुछ बांसो से और ढँक रहे हैं सफ़ेद चादर से लोग
चार कन्धों पर कर दिया सवार न जाने कहाँ ले जा रहे हैं मुझे लोग

अब तक बोलते आ रहे हैं झूठ राम नाम सत्य है गा रहे हैं वह लोग
अब आ गये ऐसी जगह जिसका नाम मुक्तिधाम बता रहे हैं लोग
सजा था एक चबूतरा लकड़ियों से उस पर मुझे लिटा रहे हैं लोग
अब समय आ गया वह मुझे अग्नि के हवाले करने जा रहे हैं लोग

ऋषभ जैन “आदि”

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