ग़ज़ल।क़ीमत चुकाई तो नही जाती ।

ग़ज़ल।कीमत चुकाई तो नही जाती।

रदीफ़-तो नही जाती ।
काफ़िया–दिखाई चुकाई लुटाई बताई निभाई गवांई मिटाई भुलाई ।

मतला-
अदाओं की कशिश हर पल दिखाई तो नही जाती ।
वफ़ाओं की सदा क़ीमत चुकाई तो नही जाती ।।

शेर-
अमानत आपकी ही है जिसे चाहो निशाँ कर दो ।
मग़र हर शख़्स पर इज्ज़त लुटाई तो नही जाती ।

तेरे क़िरदार में झांका मुहब्बत हो गयी मुझको ।
मग़र हर बात दिल की अब बताई तो नही जाती ।।

मुक़र जाना ही वाज़िब था दिखा मासूम वो चेहरा ।
गमों में ली गयी कश्मे निभाई तो नही जाती ।।

तरस खाकर करोगे क्या मेरी मासूमियत पर तुम ।
कभी ख़ैरात में चाहत गवांई तो नही जाती ।।

तेरे ख्वाबो के वारिश हम लवारिश हो गये देखो ।
यूँ ही जिंदगी तुम पर मिटाई तो नही जाती ।।

मकता-
भले हो बेवफ़ा कोई यहाँ दिल तोड़कर “रकमिश” ।
मग़र यादें मुहब्बत की भुलाई तो नही जाती ।।

राम केश मिश्र

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/03/2016
  2. pankaj charpe Pankaj Charpe 27/03/2016

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