नन्ही गुडिया

नन्ही गुडिया

धूली भरा नन्हा शरीर
आभा बिखेर रहा अजीब।
नन्हें कर, नन्ही चूडिय़ाँ
लगती जैसे खांड की पुडिय़ा ।
ओढ़े सिर लाल चुनरिया
अद्भूत प्यारा उसका शरीर।
आभा बिखेर रहा अजीब।
दोपहर सडक़ के एक छोर से
मिलने जा रही परिजनों से
गले हार पैरों में पायल
लगता आकर्षक उसका शरीर।
आभा बिखेर रहा अजीब।
हरे लहंगे पर छिटकारी
रंग बिरंगी कोटी प्यारी
बिखरे बाल छोटी सी चोटी
लगता प्यारा उसका शरीर
आभा बिखेर रहा अजीब।
पागल हिरणी की तरह
ईधर-ऊधर बार-बार
फेरती घबराई हुई नजर
हिरणी जैसा चंचल शरीर
आभा बिखेर रहा अजीब।
मैंने उसे जब देखा
मन मेरा सिहर उठा
आँखें लगी देखने उसे
पुलकित हुआ मेरा शरीर
आभा बिखेर रहा अजीब ।

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