कंवल की होली

आज तो रंग दो मुझे गुलाबी, कि रंगीला फागुन आया रे
अब हरा रंग न भाए जरा भी, कि रंगीला फागुन आया रे

सिमटे थी तेरे प्रेम की अगन, घूंघट से मैं शर्माया रे
दरस के तेरी किरण पड़ी तो, मस्ती का बादल छाया रे

घूंघट के पट खुल गये हैं सारे, स्वर्णिम आभा में नहाया रे
गाल हो गए हैं लाल स्वयं ही, व्यर्थ ही गुलाल लगाया रे

गोरा बदन है अर्पण तुम पर, मन में तुम्हें यूँ बसाया रे
झड़ गई माया की पंखुड़ियाँ सारी, सब तुम में है समाया रे

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