ये दिल तरसता है – सर्वजीत सिंह

ये दिल तरसता है

जब होती है बरसात बादल गरजता है
साजन तुझसे मिलने को ये दिल तरसता है
के याद आने लगी, के जान जाने लगी

सावन के महीने में क्यों चले गए परदेस
काँटों सी लगती है ये फूलों भरी सेज
आंसू ऐसे बहते हैं के गगन बरसता है
साजन तुझसे मिलने को ये दिल तरसता है
के याद आने लगी, के जान जाने लगी

मौसम भी ऐसा है के ये दिल तड़पाता है
रह-रह के तेरी यादों के सपने सजाता है
मीठी-मीठी हवाओं मैं जब दुपट्टा सरकता है
साजन तुझसे मिलने को ये दिल तरसता है
के याद आने लगी, के जान जाने लगी

अब तो तू आजा ज़ालिम ओर ना देर लगा
प्यार करने की मुझको इतनी ना दे सज़ा
तेरे ही इंतज़ार में अब हर पल गुज़रता है
साजन तुझसे मिलने को ये दिल तरसता है
के याद आने लगी, के जान जाने लगी

लेखक : सर्वजीत सिंह
sarvajitg@gmail.com

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/03/2016
    • sarvajit singh sarvajit singh 23/03/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/03/2016
    • sarvajit singh sarvajit singh 23/03/2016

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