प्रात: काल की बेला

प्रात: काल की बेला देखो
फूल- फूल खिल उठता है
ओस की बूंदें पड़ कर उसमें
मोती सा चमकाता है |

पेड़ – पेड़ और पत्ते – पत्ते
खिल उठते उस बेला में
पत्ता – पत्ता झूम उठा है
और डाली – डाली झूल उठी |

चिड़ियाँ चहक उठीं पेड़ों पर
अपने स्वर सुनाने को
मुर्गा देता बांग वहाँ पर
सबको सुबह उठाने को |

इस बेला में सूरज निकला
लेकर अपनी किरणों को
आसमान में छाई लाली
पंछी गुंजन करने को |

मंदिर- मंदिर में शंख बजता
और पुजारी पूजा करता
विधार्थी गण उठ जाते हैं
और अपना पाठ याद कर लेते हैं |

जो सदा इस बेला में उठ कर घूमता
वो स्वत: सदा स्वस्थ रहते हैं
इस बेला की पवन सुहानीं
तन – मन सबको शुध्द कर देते हैं |

Kamlesh Sanjida photo
कमलेश संजीदा , गाजियाबाद
प्रात काल  की  बेला

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 21/03/2016

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