खो दिया है मैने

कितने दिन बीत गए
खुली आसमान तले बैठे,
असंख्य तारों को गिने
और चंद्रमा में छिपी बूढ़ी अम्मा को खोजे।
आज जब मेरी घर की दिवारें हो गई हैं ऊचीं,
आज जब मेरे हाथों ने
चाय की कप के जगह पकड़ा है कॉफी मग को,
आज जब मैं अकेले झूले पर बैैठी हूँ

तब हुआ मुझे एहसास
कि मैंने जो पाया है
उसके लिए मैंने क्या -क्या खोया है।।

खो दिया है मैंने –
दिवारों के उस पार से
गुजरने वाली परिचित मुस्कुराहटों को,

ईट के चबूतरे पर सखियों संग बैैठ
हँसने ,मुस्कुराने को,
एक -दूसरे के सारे गूढ़ रहस्यो को ईमानदारी से एक दूसरे के दिलो तक
हीं समेट लेने को ।

खो दिया है मैंने –
चाय की मिठास के साथ
घुलने वाली गपशप और ठहाकों को,
दिल से दिल को जोड़ने वाली सारी बातों को ।।

खो दिया है मैंने –
मेरी रूह को समेटने वाली
सच्ची एहसासो को,
मेरे मन को मेरे मन से मिलाने वाली
सच्ची जज्बातो को।

सच…

खो दिया है मैंने –
अनमोल लम्हों को,
अमिट साथों को,
सादगी में लिपटी
पवित्र जिन्दगी की
बीती हुई कड़ियों को ।।

4 Comments

  1. Jay Kumar 21/03/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/03/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 21/03/2016
  4. आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 31/03/2016

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