भारत की दुर्दशा

———–हिंदुस्तान की दुर्दशा ———-

उजड़ते हिन्द के गुलशन की बस इतनी कहानी है
कहीँ मुन्नी की बदनामी है शीला की जवानी है

सभी हैं बेशरम फूहड़ हैं सारे और व्यभिचारी
फ़िर भी शौक से कहते हैं दिल हिन्दोस्तानी है

कोई कहता कि माल टंच है और है फिगर अच्छा
यहाँ नेताओं में जिन्दा वो नेहरु की रवानी है

यहाँ आइडल युवाओं के हनी सिंह और लियोनी हैं
न कोई है भगत सिंह ना कोई झाँसी की रानी है

सभी अब झूमते पीकर करें बर्बाद घर अपने
बड़े ही शान से कहते कि मस्त ज़िन्दगानी है

अब तो भौंकते कुत्ते सभी अपने ही मालिक पर
वो बातें थीं वफादारी की अब लगती पुरानी हैं

यहाँ जयचंद हैं जिन्दा हज़ारों और जाफ़र हैं
पराक्रम आज प्रथ्वी का कोई लगता कहानी है

दिखाएँ ढोंग सब मिलकर के टूटी टाँग को लेकर
मगर ढाबों में जाके सबको बोटी ही चबानी है

सबूतों की कमी पर घूमते बाहर यहाँ टुण्डा
मगर प्रज्ञा के जैसों को हवा जेलों की खानी है

लगा दो आग कहता “देव” सारे भ्रष्ट लोगों को
अब तो देख हालत हिन्द की आँखों में पानी है

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
9675426080

Leave a Reply