पृथ्वी

पृथ्वी

सूरज की आहत किरणों से
दी है तुमने राहत मुझे
छम-छम गिराकर मधु धार से
तृप्त तुमने किया है मुझे ।
आँखें मुंदे पागल होकर
करने लगी मैं तांडव नृत्य
बयार चले सुवाषित होकर
पंछी गुंजन लगे हैं करने
फि र भला कैसे रह पाती
सखियां सजाने लगी हैं मुझे।
छम-छम गिराकर मधु धार से
तृप्त तुमने किया है मुझे ।
हर समय तपती किरणों से
आँचल बन बचाया मुझे
खुद पर झेली आग ये सारी
शीतलता दी तुमने मुझे
ओ प्यारो ओ सुन्दर मुघों
हर सुख तुमने दिया है मुझे।
छम-छम गिराकर मधु धार से
तृप्त तुमने किया है मुझे ।
अनायास मेरे मुख से
फु ट पड़ी ठंडी सिसकारी
हाथ उठे ऊपर मेरे
खिलने लगी है फु लवारी ,
छुकर अपने तन से जैसे
दिया है एक नया रूप मुझे
छम-छम गिराकर मधु धार से
तृप्त तुमने किया है मुझे ।

Leave a Reply