गाए फगुआ कबीर

गाए फगुआ कबीर
जागे सुलझे हैं सौ सवाल
हर आहट है गुलाल
गीत गुनगुनाने हैं
पूजा का सजा थाल
अच्छा है हालचाल
ओढ़ें हैं  हवा शाल
होंठ पर बहाने हैं
साँसों में हैं  अबीर
गाये फगुआ कबीर
लगे बीच धारा भी
जैसे हो नदी तीर
नावों में खिंचा पाल
उड़ते हैं खुले बाल
शब्दों में है उछाल
भाव डगमगाने हैं
मन सबको ले सहेज
पुरवाई चले तेज
चलों खोलकर बैठे
यादों के वही पेज
एक हुये होंठ गाल
अब कैसी रख संभाल
मछली को लिखा जाल
होश फिर ठिकानेे हैं।

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