दहल दिल गया

शहीदों, सैनिकों को आतंकियों की पहरोकारी पर मूक प्रशासन तथा देश के युवाओं की व्यथा सुनाती मेरी छोटी सी रचना —

वीर पर वार से ये दहल दिल गया
पहले धरती हिली फिर गगन हिल गया
तुमने पकड़ा जिसे जान पर खेलकर
उसकी रूह से ये सारा जमां मिल गया

तेरी फूलों की बगिया जो मशहूर थी
दुश्मनों की पहुँच से बहुत दूर थी
कारवां शूल का अब वहाँ खिल गया
पहले धरती हिली फिर गगन हिल गया

जिनकी खातिर ही सरहद पे बहता लहू
बेरुखी उन दरिंदो की कैसे कहूँ
जुल्म पर सबका लगता है मुँह सिल गया
पहले धरती हिली फिर गगन हिल गया

आदमी भ्रष्ट रस्ते पे चलता यहाँ
हर गली में तिरंगा है जलता यहाँ
क्या प्रशासन यहाँ पाक से मिल गया ?
पहले धरती हिली फिर गगन हिल गया

धर्म की आड़ में जंग होती यहाँ
रोज़ गायों की बनती है बोटी यहाँ
सबकी रग में लहू बाबरी मिल गया
पहले धरती हिली फिर गगन हिल गया

अब युवा वासना के वशीभूत हैं
मैकदे में सभी पी रहे मूत हैं
हर युवा सोम से अब जला दिल गया
पहले धरती हिली फिर गगन हिल गया

हम सिकुड़ते रजाई में इस सर्द में
नींद आती है कैसे तुम्हें बर्फ में
तेज तुझ में क्या ये दिनकरी मिल गया ?
पहले धरती हिली फिर गगन हिल गया

———–कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”

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