नारी

नारी दिवस पर नारी पर होते अत्याचारों को सुनाती तथा नारी का तिरस्कार करने वाले सभी घमंडी मर्दों ललकारती मेरी ताजा रचना —

रचनाकार- कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
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व्यथा सुनाऊँ मैं नारी की कान खोल कर सब सुन लो
सुन लो मर्द घमंडी सारे अब कड़वे सच को सुन लो

नारी बन बेटी आयी सब कुप्पा बनकर फूल गये
देख के बेटी फूले फूले गाल लटककर झूल गये

आशा थी खुशहाली की पर मौत सा मातम पसरा है
लगे आगमन असुरों को दुर्गे मईया का अखरा है

बनकर बहना भी नारी ने भेदभाव को झेला है
बहना की ना परवाह है भाई पर खुशी का मेला है

रक्षाबंधन और दूज पर भी बहना ने प्यार दिया
भाई की लम्बी उम्रों का बहना ने उपहार दिया

भाई का हक पूरा बहना वंचित है अधिकारों से
मौन रहे फिर भी चाहे आहत हो अत्याचारों से

इक दिन विदा ही हो जाती है रो-रोकर ससुराल को
फ़िर ना कोई जाकर पूछे उसके हाल और चाल को

पत्नी बनकर भी नारी ने पति को परमेश्वर माना
पर नर ने परमेश्वर की मर्यादा को ना पहचाना

पत्नी ने घर द्वार सम्भाला बाँधी सा व्यवहार किया
पति ने दारू पी पीकर पत्नी पर अत्याचार किया

माँ बनकर भी इस नारी ने कष्ट सहे कई मास तक
सहती रहती दर्द अनेकों नौ महिने की आस तक

भूके रहकर भी माँ ने अपनी औलादों को पाला
फ़िर भी औलादों ने माँ की रूह को घायल कर डाला

हुआ बुढ़ापा तो नारी ने बस झेली रुसवाई है
इस नर की करतूतों पर ये आँखे भी भर आई हैं

फ़िर भी रहकर मौन ये नारी सब कुछ ही सह जाती है
वृद्धाश्रम की उम्मीदों पर ही जिन्दा रह पाती है

आदि काल से सहती आयी नारी, नर-संताप को
नारी को सम्मान सभी दो बंद करो अब पाप को

वर्ना इक दिन अहंकार टूटेगा मर्द घमंडी का
जिस दिन कोप सहेगा दुर्गे,काली सी रणचंडी का

सृष्टि का आधार है नारी, नारी जग कल्याणी है
नारी ही जग माता कहती सब संतों की वाणी है

कहे “देव” जो नर होने के अहंकार में जकड़ा है
नारी को अधिकार न दे वो मर्द नहीँ है हिजड़ा है

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