कविता

वासंती छंद
फिर बंशी कन्हैया की ऐसी बजी
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मंत्र मदन मुस्काय पढ़े सखि फागुन की ऋतु आय गई ,
बागन कोयल कूक हँसे सखि आमन बौर रिझाय गई l
चाँदनी रात है छिटकी जुन्हैया सो प्रेम ‘ सुधा ‘ बरसाय गई ,
फिर बंशी कन्हैया की ऐसी बजी भुजपाश में राधा समाय गई l

देखत दर्पण राधिके के रूप सो आपहि आप लुभाय रही ,
इक छोर चुनरिया को अधरन पै इक अंगुरिन में अरझाय रही l
साँवरो श्याम सखा रसिया रस माधुरी राधे लुटाय रही ,
फिर बंशी कन्हैया की ऐसी बजी भुजपाश में राधा समाय गई l

जमुना तट पै बंशीवट पै सखि पनघट पै भरमाय गई ,
नंदनंदन नटवर मोहन नटखट झोरी अबीर ढुराय दई l
राधा ने प्रेम भरी पिचकारी सो अंखियन धार चलाय दइ ,
फिर बंशी कन्हैया की ऐसी बजी भुजपाश में राधा समाय गई l

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  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/03/2016

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