इख्तियार नहीं होता…

जाति-मज़हब और वक़्त का,
मोहताज़, प्यार नहीं होता…
बस इक नज़र जानीब की पड़े,
फिर दिल पे इख्तियार नहीं होता…

इंदर भोले नाथ