“चेहरा नजर नही आता किसी को भी परछाई का”

चेहरा नजर नही आता किसी को भी परछाई का ।
अंदाजा कोन लगा सकता हैं दील की घेहराई का ।
कोई पास भी आये तो रूठ जाती हैं ,
कुछ ऐसा रिश्ता हैं , मुझसे मेरी तन्हाई का ।
ऐसे रिश्ते मे कैद कर दिया हैं मुझको ,
के अब कोई सबब ही नही मिलता मेरी रिहाई का ।
वो जुदा हुआ हैं मुझसे मेरी हर खुशी के लिये ,
उसे अब क्या सजा दे उसकी ईस बेवफ़ाई का ।
जी तो चहता हैं के लिख दु दर्द दील का सब ,
पर कोई रंग भी तो नही आँसुओं की श्याही का ।

-एझाझ अहमद

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