* क्या कहूँ *

* क्या कहूँ *

क्या कहूँ किस से कहूँ
व्यथित ह्रदय की बात
सुनने को तो बहुत सुनते
फिर उड़ाते हैं मजाक।

क्या कहूँ हाले दिल का
अपना हारा बना बेचारा
कोई नहीं देता सहारा
सभी कर लेते किनारा।

क्या कहूँ मैं कैसे हारा
यहाँ है बहुत ठगी
छल प्रपंच के अनेको जमात
जिनका नहीं कोई विसात।

मैं क्या कहूँ तुम से
की तुम न हारना
धीरज ह्रदय में धरना
ईश्वर को न विसारणा।

छल प्रपंच में न पड़ना
सत्य कर्म पर चलना
लोभ लालच मज़बूरी में
ठगों का पला न पड़ना।

2 Comments

  1. Saviakna Saviakna 07/03/2016
  2. नरेन्द्र कुमार नरेन्द्र कुमार 07/03/2016

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