देख रहा हूँ…

अलग-अलग ले राह यहाँ मैं सबको चलते देख रहा हूँ,
दुनियाँ पहले भी बदली थी और बदलते देख रहा हूँ,

खुद को पिछड़ा कहलाने की होड़ मच रही है रह-रहकर,
आरक्षण की मांग में अपने देश को जलते देख रहा हूँ,

एक अकेला खड़ा हुआ जो देश के दर्द मिटाने को तो,
कदम-कदम पे उसे गिराने सबको बढ़ते देख रहा हूँ,

कल तक फूटी आँख भी जो बर्दाश्त नहीं थे इक-दूजे को,
आज सभी उन नेताओं को हँस-हँस-मिलते देख रहा हूँ,

राजनीति में भटके युवा और बुरा दुर्भाग्य क्या होगा,
देश के दिल की अँगनाई में, कांटे खिलते देख रहा हूँ,

देशभक्त की कुर्बानी पे जुबां नहीं खुलती है जिनकी,
आतंकी के मौत पे उनको क्रांति करते देख रहा हूँ,

पत्रकारिता पैसों के बाज़ार में जबसे तौली गई है,
सच की चादर ओढ़े झूठ को फूलते-फलते देख रहा हूँ,

सत्य,न्याय और धर्म की बातें ये तो महज़ दिखावा भर है,
अवसर पाकर चिता-अग्नि पे दाल को गलते देख रहा हूँ,

मेरे जैसे और कितने ही, व्यथित हो रहे हैं इन सब से,
मेरे शब्दों में उनकी भावनायें मचलते देख रहा हूँ …