वक़्त

कैसी दुनिया है यह ,
जहाँ कोई अपना नहीं,
ना ही अपनापन होने का एहसास ।

सिर्फ कांच के कुछ टुकड़े हैं,
जिन्हे जोड़ना आसान नहीं,
फिर भी इन्ही टुकड़ों में मै खुद को देखता हूँ ।

कैसे रिश्ते हैं यह ,
जो बेगाने हो चले हैं ,
जैसे लगता है सूखे पत्ते कि तरह टूटकर बिखर रहे है ।

कैसा प्रेम है यह,
जिसमे कोई धड़कन नही है,
ऐसा लगा हो जैसे फूलों ने भवरे को कुम्लहा कर मरने के लिए छोड़ दिया हो ।

कैसी वेदना है यह,
जिसमे कोई तड़प नहीं है ,
जैसे लगता हो माँ ने बच्चे को तपती दुपहरी में छोड़ दिया हो ।

कैसी यह पैसे कि लालसा है,
जिसमे ज़ान तो हैं पर जज्बात नहीं है ,
जैसे लगता हो मृग ने अपनी कस्तूरी मनुष्य़ के हवाले कर दिया हो ।

सब कुछ तो है यहाँ ,
पर ख़ुशी नहीं है,
ऐसा लगता है किसी ने धड़कते हुए दिल को निकाल दिया है ।

हर तरफ मुझे फीके हुए चेहरे दिखते है ,
अलसायी हुई आँखे दिखती हैं,
मुरझाये हुए चेहरे दिखते हैं,
मनुष्य़ कि खाल पहने भेड़िये दिखते हैं,
ओठों पे मुस्कान पर, दिल में ज्वाला दिखती हैं ।

लगता है मासूमियत को हवा लग गयी है ,
मधुरता और समरसता गायब हो गयी है ,
हिम्मत और जज्बा ख़तम हो गयी है ,
दिल के तराने अब अफ़साने बन गए है ,
दोस्त अब हमसफ़र तो क्या हमराही भी नहीं बनते हैं ।

क्या करेंगे हम इन पैसों का,
जब कोई इसकी क़द्र ही ना करे,
जब कोई अपना मिलकर बासुरी कि राग ना गाये,
और जब इन रागो के तले तारे ना झिलमिलाये ।

ए स्वराज ! वक़्त कब करवट बदलेगा कोई नहीं जानता ,
कब भाग्य कि रेखा बदलेगी कोई नहीं जानता ,
फिर भी आपको अपनी गोरी चमड़ी पर घमंड हैं ,
फिर भी आपको कुबेर होने का घमंड हैं ।

बातें बदलेगी लोग बद्लेगे ,
पर उन्हें क्या वो तो लगता है कभी नहीं बदलेंगे ,
दिशाएं बदलेंगी ऋतुए बदलेंगी पर वो नहीं बदलेंगे ,
अकेले तनहा होते हुए भी लोग अपनी तिजोरिया भर रहे हैं ,
किसके लिए सारे विश्व का पाप अपने सर पर डाल रहे हैं ।

वक़्त की नजाकत समझ ए इंसान ,
बन तू इतना नादान ,
की लोग कहने लगे तुझे शैतान ,
अब तो छोड़ दे अपने खतरनाक अरमान ।

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  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/03/2016

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