कहर गरीबी का (०५ मार्च २०१६)

कहर गरीबी का देख मैं
मैं तुमको आज बतलाता हूँ
अपने ही इसी देश की
व्यथा में सुनाता हूँ ।

मुँह से कहने में भी अब तो,
मैं कुछ कह नहीं पाता हूँ
पर क्या कहूँ अपने दिल की
कहे बिन न रह पाता हूँ।

एक दरिद्र माँ की स्थिति
ऐसी मैं बतलाता हूँ
लिपटी कपडे के छोटे से टुकड़े में
उसकी इज़्ज़त मैं ढकता हूँ।

लोग देखकर अनदेखा करते
मैं कैसे रह पाता हूँ
इसका तो कोई जवाब नहीं
फिर भी शब्दों में बतलाता हूँ।

वो शब्द नहीं हैं मेरे अंदर
मैं कलम से कहाँ लिख पाता हूँ
उस गाँव का भयावह मंजर
मैं कहाँ दिखला पाता हूँ।

कूड़े पर पड़े ढेर में
जब अन्न के दाने चुगते देखता हूँ
उधर पशुओं के गोबर से निकालकर
कुछ दाने खाता देखता हूँ।

यही हालत जब नंगे बदन बच्चों को
रेलवे किनारे पटरिओं पर देखता हूँ
लोगों के फेंके गए खाने के पैकिट को
उन बच्चों को चाटते देखता हूँ।

अंदर कितनी व्यथा है मेरे
ये कहाँ समझा पाता हूँ
कौन जिम्मदार है इस व्यवस्था का
मैं कहाँ किसको दोष लगाता हूँ।

ऐ लोगों अब तो जागो
ये सबको समझाता हूँ
अपने देश की जिम्मेदारी
अपने आप निभाने की कहता हूँ।

Kamlesh Sanjida photo
कमलेश संजीदा , गाजियाबाद

केहर गरीबी का