बादल

मैं हूँ काला बड़ा अनोखा
मुझको सब पहचाने
मेरी मनोहर छठा देखकर
सबके दिल खिल जाते |

आगे बढ़ता चला जाऊं मैं
ठंडी- ठंडी पवन सहारे
बढ़ता चलता चला जाऊ मैं
मैं गगन की सैर करूँ |

मेरी सब प्रतीक्षा करते
सुन्दर फूल खिला दूँ मैं
पपीहा देख मुझसे खुश होते
सुन्दर-सुन्दर गीत सुनाते |

मन बैचेन था गर्मी से
धरती प्यासी गर्मीं से
मैं धरती की प्यास बुझाऊ
गर्मीं से मैं राहत दिलाऊ |

मेरी नन्ही- नन्ही बूंदें
कितना कुछ कर दे
पृथ्वी में दबे बीज को
सुन्दर जीवन देती उसको |

जब अधिक गर्मी पड़ती
तब मैं भाप बनकर उड़ता
जब मुझे शीतल पवन मिलती
तब मैं जोर से बरस पड़ता |

Kamlesh Sanjida photo
कमलेश संजीदा , गाजियाबाद

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