जरा रुक…..

चलते चलते ऐ! मुसाफिर पीछे मुड़कर तो देख
कहाँ ले जायेगा तेरा ये सुख
सफर में ना तूने दिया किसी को सुख
फिर अपने लिए क्यों ढूंढता है तू सुख
देखती है, आँखे तेरे अपनों की| जरा रुक ….
उस बूढी की लाठी बन जिसने किया सब कुछ निछावर सुख
उस बूढी की हड्डियों की ताकत बन जिसने तुझे कंधे पर बिठा कर दिया राजा का सुख
दे उन्हें अंतिम यात्रा का सुख
जिसने तुझे दिए जीवन के हर सुख

– काजल / अर्चना

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  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/03/2016

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