पवन

बहती हूँ मैं मन्दम-मन्दम
मेरे बिन न जी पता कोई
मैं तो सबका जीवन हूँ
सदा बहती रहती हूँ |

मेरा काम है बहते रहना
तुम्हारे मन को बहलाती
सबके अन्दर तक हो आती
मैं सबको ठंडक पहुँचाती |

मैं किसी को दिखती नहीं
मन माना आनंद पहुँचाती
मेरा रंग न जाने कोई
और मुझे न पहचाने कोई |

तुम सब मेरा केवल अनुभव करते
हर पल तुम्हारे संग में रहती
जहाँ- जहाँ तुम जाते हो
वहाँ- वहाँ मुझको पाते हो |

मेरे कारण ही सब जीते
मैं हूँ अन्दर मैं हूँ बाहर
जीवन के हर कण-कण में मैं हूँ
पौधों और वृक्षों के त्रण-त्रण में, मैं हूँ |

मैं तो सबके मन को भाती
मैं तो तुम्हारे अन्दर तक हो आती
मैं सुन्दर-सुन्दर गीत सुनाती
और सबको खुश कर जाती |

मैं तो सबको जीवन देती
मैं छोटे रोमों के सहारे
तुम्हारे अन्दर तक हो आती
मन मोहक सुगंध फैलाती |

फूलों को ठन्डे झोके देकर
उनसे मधुर मकरंद लाती
मुझको करते हैं सभी पसंद
और मैं सबको आनंद पहुचाती |

मैं सब जगह नव संचरण करती
मेरे ही कारण तुम ठंडक पाते
कुछ अमीरों ने मुझे ऐसे जकड़ा
ऐo सीo के नाम पर मुझको पकड़ा |

आज दुनियां के अविष्कारों ने
मुझको दूषित ही कर डाला
और नए- नए कल कारखानों ने
मुझको ही बदल डाला -3 |

Kamlesh Sanjida photo
कमलेश संजीदा , गाजियाबाद