नदी

कल- कल करती रहती हूँ
पत्थरों से टकराती हूँ
रुकना मेरा काम नहीं
सदा बहती रहती हूँ |

गंगा यमुना कृष्णा कावेरी
अनेकों मेरे नाम हैं
उत्तर दक्षिण सब में फैली
सबके कारण ही हूँ मैली |

मस्ती से मैं बहती जाती
सबको अपना जल देती जाती
धरा के कण- कण में समाती
अपना प्यार बांटती जाती |

अपनी राह बनाती जाती
जग की सुन्दरता बढाती जाती
खेतों को खुश करती जाती
हरियाली उनमें लहलाती जाती |

सबके कष्ट मिटाती जाती
और दर्दों को, मैं दूर भगाती जाती
तीर्थ बनते, मैले लगते
सुख शांति, सब मुझसे पाते |

पैदल-पैदल चलती जाती
धरा का अन्तस्थल धोती जाती
सदा आगे बढती जाती
मानव को सुख देती जाती |

Kamlesh Sanjida photo
कमलेश संजीदा , गाजियाबाद