सूरज की किरणे

पर्वत के शिखरों से चल कर
जो हम तक पहुँच पातीं हैं
नील गगन की शोभा न्यारी
मेरी किरणों से हो जाती है |

पर्वत पर जमी बर्फ को
अपनी गर्मीं से पिंघलातीं हैं
नीले -नीले झरने झरते
तुमको भी ख़ुशी दिलाती हैं |

मेरी किरणे अजब न्यारी
लाल – पीले रंग दिखलातीं
मेरी किरणों के कारण ही
तुम्हारी फसलें पक हैं पातीं |

कमल खिलाती, गुलाब खिलातीं
तृण – तृण में खुशियां ले आतीं
और नील गगन में छा जाती
इंद्र धनुष की भी, शोभा न्यारी हो जाती |

प्रात: काल होते ही
मैं अपनी किरणे फैलता
नदियों के नीले जल को
चाँदी जैसा चमकाता |

धीरे-धीरे नील गगन में आता
शिखरों पर मैं चढ़ता जाता
काली रात देख मुझसे भागे
दिन में, मैं उजियारा लाता |

Kamlesh Sanjida photo
कमलेश संजीदा , गाजियाबाद